श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  1.130.46-47 
अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाञ्चालो यदा तदा।
त्वद्भोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे॥ ४६॥
मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च।
एवमुक्त्वाथ वव्राज कृतास्त्र: पूजितो मया॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
‘पिताजी! जब पांचालराज मुझे राजा अभिषिक्त करेंगे, तब मेरा राज्य आपके अधीन हो जाएगा। मित्र! मैं सत्य शपथ लेकर कहता हूँ कि मेरे समस्त सुख, धन और सुख आपके अधीन हो जाएँगे।’ ऐसा कहकर, शस्त्रविद्या में निपुण होकर और मुझसे सम्मानित होकर वह अपने देश को लौट गया। ॥46-47॥
 
‘Father! When the King of Panchala anoints me as the king, then my kingdom will come under your control. Friend! I swear by the truth that all my pleasures, wealth and happiness will be under your control.’ Having said this, having become proficient in the art of weapons and being honoured by me, he returned to his country. ॥ 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)