श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.130.45 
अब्रवीदिति मां भीष्म वचनं प्रीतिवर्धनम्।
अहं प्रियतम: पुत्र: पितुर्द्रोण महात्मन:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी! एक दिन उन्होंने मुझसे कुछ ऐसा कहा जिससे मेरी प्रसन्नता बढ़ गई - 'द्रोण! मैं अपने पितामह का परम प्रिय पुत्र हूँ।'
 
Bhishmaji! One day he said to me something which increased my happiness - 'Drona! I am the most beloved son of my great father. 45.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)