श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.130.44 
बाल्यात् प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च।
स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकर:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
बचपन से ही हम दोनों साथ-साथ पढ़ते थे। वहाँ द्रुपद मेरे घनिष्ठ मित्र थे। वे मुझसे सदैव मधुर वचन बोलते और मेरा प्रिय कार्य करते थे॥ 44॥
 
Since childhood we both used to study together. Drupada was my close friend there. He always used to speak sweet words to me and do my favourite work.॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)