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mahabharat 1.130.43: वे उस गुरुकुल में मेरे बहुत सहायक और प्रिय मित्र थे। प्रभु! मैं उनके साथ आश्रम में बहुत समय तक रहा। 43.   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.130.43 
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे।
तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
वे उस गुरुकुल में मेरे बहुत सहायक और प्रिय मित्र थे। प्रभु! मैं उनके साथ आश्रम में बहुत समय तक रहा। 43.
 
He was a very helpful and dear friend of mine in that Gurukul. Prabhu! I stayed in the ashram with him for a long time. 43.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)