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mahabharat 1.130.42: उन दिनों पांचालों के महाबली राजकुमार यज्ञसेन द्रुपद भी धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हीं गुरुदेव अग्निवेश के पास रहे।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.130.42 
पाञ्चालो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबल:।
इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत् तस्मिन्नेव गुरौ प्रभु:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
उन दिनों पांचालों के महाबली राजकुमार यज्ञसेन द्रुपद भी धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हीं गुरुदेव अग्निवेश के पास रहे।
 
In those days the mighty prince of the Panchalas, Yagnasena Drupada, who was very powerful, also stayed with the same Gurudev Agnivesh to receive education in Dhanurveda.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)