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mahabharat 1.130.41: मैं वहाँ कई वर्षों तक विनम्र हृदय से, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, जटाधारी होकर रहा। मैं गुरु के आश्रम में बहुत समय तक रहा और निरंतर उनकी सेवा में लगा रहा।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.130.41 
ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुला: समा:।
अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रत:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
मैं वहाँ कई वर्षों तक विनम्र हृदय से, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, जटाधारी होकर रहा। मैं गुरु के आश्रम में बहुत समय तक रहा और निरंतर उनकी सेवा में लगा रहा।
 
I stayed there for many years, with a humble heart, observing celibacy and wearing matted locks on my head. I stayed in the Guru's ashram for a long time, constantly engaged in his service.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)