श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.130.40 
द्रोण उवाच
महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत।
अस्त्रार्थमगमं पूर्वं धनुर्वेदजिघृक्षया॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
द्रोणाचार्य बोले - हे अपनी प्रतिज्ञा से कभी पीछे न हटने वाले भीष्मजी! बहुत समय पहले मैं महर्षि अग्निवेश के पास अस्त्र-शस्त्र चलाने की कला सीखने तथा धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने गया था।
 
Dronacharya said - O Bhishmaji, who never goes back on his vows! A long time ago, I had gone to Maharishi Agnivesh to learn the art of using weapons and to acquire knowledge of Dhanurveda.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)