श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.130.4 
द्रुपद उवाच
अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा।
यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज॥ ४॥
 
 
अनुवाद
द्रुपद बोले - हे ब्रह्मन्! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारहीन और अपरिपक्व है। तुम्हारी यह बुद्धि सत्य नहीं है। इसीलिए तुम मुझसे धृष्टतापूर्वक कह ​​रहे हो, 'हे राजन! मैं तुम्हारा मित्र हूँ।'
 
Drupada said - O Brahman! Your intellect is completely devoid of sanskars and immature. This intellect of yours is not true. That is why you are impudently saying to me, 'O King! I am your friend'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)