श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.130.28 
अस्या वीर्यं निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते।
भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तुम सब लोग इसका बल देखो, जो किसी और में नहीं है। मैं पहले एक लकड़ी से गेंद को छेदूँगा; फिर दूसरी लकड़ी से पहली लकड़ी को छेदूँगा॥28॥
 
You all should see its strength, which is not there in any other. I will first pierce the ball with one stick; then I will pierce the first stick with the second stick.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)