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mahabharat 1.130.26-27h: युधिष्ठिर ने कहा, "ब्राह्मण! कृपाचार्य से अनुमति लेकर तुम यहीं सदा के लिए निवास करके भिक्षा लो।" उनकी यह बात सुनकर द्रोण मुस्कुराये और भरतवंशी राजकुमारों से बोले, "हे भरत! तुम सब लोग मेरे साथ रहो और भिक्षा लो।"   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  1.130.26-27h 
युधिष्ठिर उवाच
कृपस्यानुमते ब्रह्मन् भिक्षामाप्नुहि शाश्वतीम्॥ २६॥
एवमुक्त: प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम्।
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, "ब्राह्मण! कृपाचार्य से अनुमति लेकर तुम यहीं सदा के लिए निवास करके भिक्षा लो।" उनकी यह बात सुनकर द्रोण मुस्कुराये और भरतवंशी राजकुमारों से बोले, "हे भरत! तुम सब लोग मेरे साथ रहो और भिक्षा लो।"
 
Yudhishthira said, "Brahmin! Take permission from Kripacharya and stay here forever and collect alms." On hearing him say this, Drona smiled and said to the princes of Bharat dynasty.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)