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mahabharat 1.130.2: जब उनके मित्र द्रोण ने इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहा, तो पांचाल के राजा द्रुपद उनके वचनों को सहन नहीं कर सके।   |   mahabharat अध्याय 1.130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.130.2 
इत्येवमुक्त: सख्या स प्रीतिपूर्वं जनेश्वर:।
भारद्वाजेन पाञ्चालो नामृष्यत वचोऽस्य तत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
जब उनके मित्र द्रोण ने इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहा, तो पांचाल के राजा द्रुपद उनके वचनों को सहन नहीं कर सके।
 
When his friend Drona spoke thus lovingly, King Drupada of Panchala could not tolerate his words.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)