श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 130: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी गुल्ली और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.130.11 
नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्य नारथी रथिन: सखा।
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदज्ञ) का मित्र नहीं हो सकता। जो सारथी नहीं है, वह सारथी का मित्र नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजा का मित्र नहीं हो सकता। फिर पुरानी मित्रताएँ क्यों याद आती हैं?॥11॥
 
One who is not a Shrotri cannot be a friend of a Shrotri (Veda-knower). One who is not a charioteer cannot be a friend of a charioteer. Similarly, one who is not a king can never be a friend of any king. Then why do you remember old friendships?॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)