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mahabharat 1.13.6-8: उग्रश्रवाजी बोले - शौनकजी! ब्राह्मण कहते हैं कि यह इतिहास बहुत पुराना है। पूर्वकाल में मेरे पिता लोमहर्षणजी ने, जो व्यासजी के तेजस्वी शिष्य थे, ऋषियों के पूछने पर, स्वयं श्रीकृष्ण द्वैपायन (व्यास) द्वारा कही गई इस कथा को नैमिषारण्य में रहने वाले ब्राह्मण समुदाय को सुनाया था। मैं भी उन्हीं से सुनकर ज्यों का त्यों कह रहा हूँ। 6-8।   |   mahabharat अध्याय 1.13: जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 13: जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 6-8
 
 
श्लोक  1.13.6-8 
सौतिरुवाच
इतिहासमिमं विप्रा: पुराणं परिचक्षते॥ ६॥
कृष्णद्वैपायनप्रोक्तं नैमिषारण्यवासिषु।
पूर्वं प्रचोदित: सूत: पिता मे लोमहर्षण:॥ ७॥
शिष्यो व्यासस्य मेधावी ब्राह्मणेष्विदमुक्तवान्।
तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवक्ष्यामि यथातथम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी बोले - शौनकजी! ब्राह्मण कहते हैं कि यह इतिहास बहुत पुराना है। पूर्वकाल में मेरे पिता लोमहर्षणजी ने, जो व्यासजी के तेजस्वी शिष्य थे, ऋषियों के पूछने पर, स्वयं श्रीकृष्ण द्वैपायन (व्यास) द्वारा कही गई इस कथा को नैमिषारण्य में रहने वाले ब्राह्मण समुदाय को सुनाया था। मैं भी उन्हीं से सुनकर ज्यों का त्यों कह रहा हूँ। 6-8।
 
Ugrashravaji said - Shaunakji! Brahmins say that this history is very old. Earlier my father Lomaharshanji, who was a brilliant disciple of Vyasaji, on being asked by the sages, had narrated this history as told by Shri Krishna Dwaipayana (Vyasa) himself to the community of Brahmins living in Naimisharanya. I am also narrating it as it is after hearing it from him. 6-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)