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mahabharat 1.13.25: तत्! पुत्रवान पुरुष इस लोक में जो उत्तम गति प्राप्त करता है, वह अन्य लोग धर्मानुसार फल देने वाले भली-भाँति संचित तप से भी नहीं प्राप्त कर सकते ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 1.13: जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 13: जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.13.25 
न हि धर्मफलैस्तात न तपोभि: सुसंचितै:।
तां गतिं प्राप्नुवन्तीह पुत्रिणो यां व्रजन्ति वै॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तत्! पुत्रवान पुरुष इस लोक में जो उत्तम गति प्राप्त करता है, वह अन्य लोग धर्मानुसार फल देने वाले भली-भाँति संचित तप से भी नहीं प्राप्त कर सकते ॥25॥
 
Tat! The noble progress that a man with a son attains in this world is not attained by other people even through well-accumulated penance which gives results as per the religion. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)