शौनक उवाच
किमर्थं राजशार्दूल: स राजा जनमेजय:।
सर्पसत्रेण सर्पाणां गतोऽन्तं तद् वदस्व मे॥ १॥
निखिलेन यथातत्त्वं सौते सर्वमशेषत:।
आस्तीकश्च द्विजश्रेष्ठ: किमर्थं जपतां वर:॥ २॥
मोक्षयामास भुजगान् प्रदीप्ताद् वसुरेतस:।
कस्य पुत्र: स राजासीत् सर्पसत्रं य आहरत्॥ ३॥
स च द्विजातिप्रवर: कस्य पुत्रोऽभिधत्स्व मे।
अनुवाद
शौनकजी ने पूछा- सूतजी! राजाओं में श्रेष्ठ जनमेजय ने सर्पसत्र से सर्पों को क्यों मारा? यह घटना मुझसे कहिए। सूतनंदन! इस विषय का सब विवरण यथार्थ रीति से वर्णन कीजिए। जप-यज्ञ करने वाले पुरुषों में श्रेष्ठ महाबली ब्राह्मण आस्तिक ने प्रज्वलित अग्नि में सर्पों को जलने से क्यों बचाया? तथा सर्पसत्र का आयोजन करने वाले राजा जनमेजय किसके पुत्र थे? तथा ब्राह्मणकुल के रत्न आस्तिक किसके पुत्र थे? यह मुझसे कहिए।॥1-3॥
Shaunakji asked- Sutji! Why did the best of kings, Janmejaya, kill the snakes with the Sarpasatra? Tell me this incident. Sutanandan! Describe all the details of this topic in a true manner. Why did the great Brahmin Aastik, the best of the men who perform Japa-Yagya, save the snakes from burning in the blazing fire? And whose son was King Janmejaya, who had organized the Sarpasatra? And whose son was Aastik, the jewel of the Brahmin clan? Tell me this.॥1-3॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥