श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 129: कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 61-62
 
 
श्लोक  1.129.61-62 
राम उवाच
हिरण्यं मम यच्चान्यद् वसु किंचिदिह स्थितम्।
ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत् तपोधन॥ ६१॥
तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना।
कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
परशुराम जी बोले - हे तपस्वी! यहाँ मेरे पास जो भी स्वर्ण आदि धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणों को दे दिया है। इसी प्रकार समुद्र पर्यन्त यह सम्पूर्ण पृथ्वी, जो ग्रामों और नगरों की पंक्तियों से सुशोभित है, मैंने महर्षि कश्यप को दे दी है। 61-62।
 
Parshuram Ji said - O ascetic! Whatever gold and other types of wealth I had here, I gave it all to the Brahmins. Similarly, this entire earth up to the sea, adorned with rows of villages and cities, I have given it to Maharishi Kashyap. 61-62.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd