श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 129: कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  1.129.50-51 
तत्रैव च वसन् धीमान् धनुर्वेदपरोऽभवत्।
स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम्॥ ५०॥
सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम्।
ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन् दित्सन्तं वसु सर्वश:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान द्रोण उसी आश्रम में रहकर धनुर्वेद का अभ्यास करने लगे। राजन! किसी समय उन्होंने सुना कि 'महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ और सर्वशस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं तथा वे शत्रुओं को संताप देने वाले वीर ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं।' 50-51॥
 
Wise Drona stayed in the same ashram and started practicing Dhanurveda. Rajan! Some time he heard that 'Mahatma Jamadagninandan Parshuramji is at this time the best among the omniscient and all-weapon wielders and he wants to donate everything to the brave Brahmins who torment the enemies. 50-51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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