श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 129: कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.129.21-22 
आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा।
चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च॥ २१॥
निखिलेनास्य तत् सर्वं गुह्यमाख्यातवांस्तदा।
सोऽचिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गत:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
और वहाँ गुप्त रूप से आकर उन्होंने अपने पुत्र को वंश आदि सब बातों की पूरी जानकारी दी। साथ ही, उसे चार प्रकार के धनुर्वेद, विविध प्रकार के शास्त्र और उनके गूढ़ रहस्यों की भी शिक्षा दी। इससे कृप थोड़े ही समय में धनुर्वेद के उत्कृष्ट आचार्य बन गए।
 
And coming there secretly, he gave his son complete information about all the things like lineage etc. He also taught him four types of Dhanurveda, various types of scriptures and their deep secrets. Due to this, Kripa became an excellent teacher of Dhanurveda in a short time.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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