श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 129: कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  1.129.2-3 
वैशम्पायन उवाच
महर्षेर्गौतमस्यासीच्छरद्वान् नाम गौतम:।
पुत्र: किल महाराज जात: सह शरैर्विभो॥ २॥
न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्धिरजायत।
यथास्य बुद्धिरभवद् धनुर्वेदे परंतप॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - महाराज! महर्षि गौतम के शरद्वान् गौतम* नाम के एक प्रसिद्ध पुत्र थे। प्रभु! कहते हैं कि वे सरकण्डों के साथ उत्पन्न हुए थे। परंतप! उनकी बुद्धि वेदों के अध्ययन में उतनी नहीं थी, जितनी धनुर्वेद में थी। 2-3॥
 
Vaishampayanji said – Maharaj! Maharishi Gautam had a famous son named Sharadvan Gautam*. Lord! It is said that they were born with reeds. Parantap! His intelligence was not so much in the study of Vedas as it was in Dhanurveda. 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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