श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 129: कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 14-17
 
 
श्लोक  1.129.14-17 
तस्याथ मिथुनं जज्ञे गौतमस्य शरद्वत:।
मृगयां चरतो राज्ञ: शन्तनोस्तु यदृच्छया॥ १४॥
कश्चित् सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत।
धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च॥ १५॥
ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह।
स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनु:॥ १६॥
स तदादाय मिथुनं राजा च कृपयान्वित:।
आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् गौतमनन्दन शरद्वान के वीर्य से एक पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। उस दिन भगवान् की इच्छा से राजा शान्तनु आखेट के लिए वन में आये हुए थे। उनके एक सैनिक ने वन में उन दोनों बालकों को देखा। बाणयुक्त धनुष और काले मृगचर्म को देखकर वह जान गया कि ‘ये दोनों धनुर्वेद में पारंगत विद्वान ब्राह्मण के बालक हैं।’ ऐसा निश्चय करके उसने राजा को वे दोनों बालक और बाणयुक्त धनुष दिखाए। राजा उन्हें देखकर उनकी कृपा से अभिभूत हो गया और उन्हें अपने घर ले गया। पूछने पर वह उनका परिचय इस प्रकार देता था कि ‘ये दोनों मेरे ही बालक हैं।’॥14-17॥
 
Thereafter, a son and a daughter were born from the semen of Gautamnandan Sharadwan. That day, by the will of God, King Shantanu had come to the forest for hunting. One of his soldiers saw those two children in the forest. Seeing the bow with arrows and the black deerskin, he came to know that ‘these two are the children of a learned Brahmin well versed in Dhanurveda’. After being sure of this, he showed the two boys and the bow with arrows to the king. The king was overwhelmed by their kindness on seeing them and took them to his home. On being asked, he used to introduce them by saying that ‘these two are my children’.॥ 14-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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