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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 128: भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  1.128.42-43 
कुमारान् क्रीडमानांस्तान् दृष्ट्वा राजातिदुर्मदान्।
गुरुं शिक्षार्थमन्विष्य गौतमं तान् न्यवेदयत्॥ ४२॥
शरस्तम्बे समुद्‍भूतं वेदशास्त्रार्थपारगम्।
अधिजग्मुश्च कुरवो धनुर्वेदं कृपात् तु ते॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जब राजा धृतराष्ट्र ने देखा कि बालक अपने खेल-कूद के कारण बहुत उपद्रवी हो रहे हैं, तो उन्होंने गौतम वंश के कृपाचार्य को, जो सरकंडों के समूह से उत्पन्न हुए थे और विभिन्न शास्त्रों के ज्ञाता थे, उन्हें शिक्षा देने के लिए बुलाया। उन्हें गुरु बनाया गया और कुरु वंश के सभी बालकों को उनके अधीन कर दिया गया। फिर कुरु बालक कृपाचार्य से धनुर्वेद का अध्ययन करने लगे।
 
When King Dhritarashtra saw that the boys were becoming very unruly due to their games and sports, he sought out Kripacharya of Gautam lineage, who was born from a cluster of reeds and was an expert in various scriptures, to teach them. He was made the teacher and all the boys of the Kuru clan were handed over to him. Then the Kuru boys started studying Dhanurveda from Kripacharya.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमप्रत्यागमने अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)