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mahabharat 1.128.26-28: इसके बाद सर्पों ने वीर भीमसेन का सत्कार किया और मंगलकामनाओं से उन्हें प्रसन्न किया। दिव्य आभूषणों से विभूषित शत्रुनाशक भीमसेन सर्पों की अनुमति लेकर प्रसन्न हुए और नागलोक से प्रस्थान करने को तैयार हुए। तभी एक सर्प ने कमलनेत्र वाले कुरुनन्दन भीम को जल से उठाकर उसी वन में (गंगा के तट पर प्रमाणकोटि में) रख दिया। तब वे सर्प पाण्डुपुत्र भीम के देखते-देखते अदृश्य हो गए। 26-28॥   |   mahabharat अध्याय 1.128: भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 128: भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा  »  श्लोक 26-28
 
 
श्लोक  1.128.26-28 
पूजितो भुजगैर्वीर आशीर्भिश्चाभिनन्दित:।
दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्त्र्य पाण्डव:॥ २६॥
उदतिष्ठत् प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिंदम:।
उत्क्षिप्त: स तु नागेन जलाज्जलरुहेक्षण:॥ २७॥
तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापित: कुरुनन्दन:।
ते चान्तर्दधिरे नागा: पाण्डवस्यैव पश्यत:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद सर्पों ने वीर भीमसेन का सत्कार किया और मंगलकामनाओं से उन्हें प्रसन्न किया। दिव्य आभूषणों से विभूषित शत्रुनाशक भीमसेन सर्पों की अनुमति लेकर प्रसन्न हुए और नागलोक से प्रस्थान करने को तैयार हुए। तभी एक सर्प ने कमलनेत्र वाले कुरुनन्दन भीम को जल से उठाकर उसी वन में (गंगा के तट पर प्रमाणकोटि में) रख दिया। तब वे सर्प पाण्डुपुत्र भीम के देखते-देखते अदृश्य हो गए। 26-28॥
 
After this, the serpents honored brave Bhimsen and pleased him with good wishes. Bhimsen, the enemy destroyer adorned with divine ornaments, took the permission of the snakes and became happy and got ready to leave from Nagalok. Then a snake lifted the lotus-eyed Kurunandan Bhima out of the water and placed him in the same forest (in Pramanakoti on the banks of Ganga). Then those snakes disappeared before Pandu's son Bhima could see them. 26-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)