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mahabharat 1.128.19: वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय!' विद्वान विदुर यह कहकर अपने घर चले गए। कुंती विचारों में मग्न होकर अपने चारों पुत्रों के साथ घर में चुपचाप बैठ गईं।   |   mahabharat अध्याय 1.128: भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 128: भीमसेनके न आनेसे कुन्ती आदिकी चिन्ता, नागलोकसे भीमसेनका आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधनकी कुचेष्टा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.128.19 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ययौ विद्वान् विदुर: स्वं निवेशनम्।
कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैर्गृहे॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय!' विद्वान विदुर यह कहकर अपने घर चले गए। कुंती विचारों में मग्न होकर अपने चारों पुत्रों के साथ घर में चुपचाप बैठ गईं।
 
Vaishampayana says, 'Janamejaya! The learned Vidur went to his house after saying this. Kunti, lost in thoughts, sat quietly in the house with her four sons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)