श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 127: पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  1.127.72 
ततस्तु शयने दिव्ये नागदत्ते महाभुज:।
अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमरिंदम:॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् शत्रुओं का नाश करने वाले महाबाहु भीमसेन सर्पों द्वारा प्रदत्त दिव्य शय्या पर सुखपूर्वक सो गये।
 
Thereafter, the mighty-armed Bhimasena, the destroyer of enemies, slept comfortably on the celestial bed provided by the serpents.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीमसेनरसपाने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीमसेनके रसपानसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)