vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 1: आदि पर्व
»
अध्याय 127: पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना
»
श्लोक 67
श्लोक
1.127.67
एवमुक्तस्तदा नागो वासुकिं प्रत्यभाषत।
यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयै:॥ ६७॥
अनुवाद
उनके ऐसा कहने पर आर्यक नाग ने वासुकि से कहा - 'नागराज! यदि आप प्रसन्न हैं, तो इस धन का क्या करेंगे?'
On his saying this, the serpent Aryaka said to Vasuki - 'King of serpents! If you are happy, then what will you do with this money?'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×