श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 127: पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना  »  श्लोक 62-63h
 
 
श्लोक  1.127.62-63h 
निश्चेष्टोऽस्माननुप्राप्त: स च दष्टोऽन्वबुध्यत।
ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्त्वा बन्धनमाशु न:॥ ६२॥
पोथयन्तं महाबाहुं त्वं वै तं ज्ञातुमर्हसि।
 
 
अनुवाद
वह अचेत अवस्था में हमारे पास आया था, किन्तु हमारे काटने पर वह जाग गया और होश में आ गया। होश में आते ही उस महाबाहु ने शीघ्रतापूर्वक अपने समस्त बंधन तोड़ डाले और हमें परास्त करने लगा। तुम जाकर उसे पहचान लो।॥62 1/2॥
 
‘He came to us in an unconscious state, but on our bite he woke up and regained consciousness. On regaining consciousness, that Mahabahu quickly broke all his bonds and started defeating us. You go and identify him.’॥ 62 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)