श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 126: पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  1.126.31-32 
यथैव पाण्डवा भूमौ सुषुपु: सह बान्धवै:।
तथैव नागरा राजन् शिश्यिरे ब्राह्मणादय:॥ ३१॥
तद्‍गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत्।
बभूव पाण्डवै: सार्धं नगरं द्वादश क्षपा:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जिस प्रकार पांडव अपने बन्धु-बान्धवों सहित बारह रातों तक भूमि पर सोए थे, उसी प्रकार ब्राह्मण और अन्य नागरिक भी भूमि पर सोए थे। इतने दिनों तक हस्तिनापुर नगरी पांडवों सहित हर्ष और उल्लास से रहित रही। वहाँ वृद्धों से लेकर बालकों तक सभी शोक में डूबे हुए थे। सारा नगर अस्वस्थ हो गया था।
 
King! Just as the Pandavas along with their relatives slept on the ground for twelve nights, the Brahmins and other citizens also slept on the ground. For so many days the city of Hastinapur remained devoid of joy and happiness along with the Pandavas. From the old to the children, everyone was immersed in sorrow there. The entire city had become unwell.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदाहे षड्‍‍विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके दाहसंस्कारसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)