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mahabharat 1.126.16-17: भीष्म और विदुरजी रोते हुए चले जा रहे थे। उस रमणीय वन में, गंगाजी के शुभ और समतल तट पर, उन्होंने बिना किसी प्रयास के महान् पराक्रम करने वाले, पुरुषों में श्रेष्ठ, सत्यवादी पाण्डु और उनकी पत्नी माद्रिका शिबिका को बैठाया। 16-17॥   |   mahabharat अध्याय 1.126: पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 126: पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  1.126.16-17 
क्रोशन्त: पाण्डवा: सर्वे भीष्मो विदुर एव च।
रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे॥ १६॥
न्यासयामासुरथ तां शिबिकां सत्यवादिन:।
सभार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोरक्लिष्टकर्मण:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
भीष्म और विदुरजी रोते हुए चले जा रहे थे। उस रमणीय वन में, गंगाजी के शुभ और समतल तट पर, उन्होंने बिना किसी प्रयास के महान् पराक्रम करने वाले, पुरुषों में श्रेष्ठ, सत्यवादी पाण्डु और उनकी पत्नी माद्रिका शिबिका को बैठाया। 16-17॥
 
All the Pandavas, Bhishma and Vidurji were going crying. In the delightful region of the forest, on the auspicious and level banks of the Ganges, they placed the truthful Pandu, the best of men, who performed great feats without any effort, and that Shibika of Madrika, his wife. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)