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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 126: पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  1.126.13-14 
याजकै: शुक्लवासोभिर्हूयमाना हुताशना:।
अगच्छन्नग्रतस्तस्य दीप्यमाना: स्वलंकृता:॥ १३॥
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्चैव सहस्रश:।
रुदन्त: शोकसंतप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
पुरोहित श्वेत वस्त्र धारण करके अग्निहोत्र की अग्नि में आहुति देते थे। वे अग्नियाँ पुष्पमालाओं से सुसज्जित और प्रज्वलित होकर पाण्डुकी की पालकी के आगे-आगे चल रही थीं। शिबिका के पीछे हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र रोते-चिल्लाते चल रहे थे। 13-14॥
 
The priests used to wear white clothes and offer sacrifices in the fire of Agnihotra. Those fires, decorated and lit with garlands, were moving ahead of Panduki's palanquin. Thousands of Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras were crying and crying after Shibika. 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)