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mahabharat 1.125.d3-27: 'उनके नाम नकुल और सहदेव हैं। वे दोनों भी अनन्त तेज से संपन्न हैं। ये महापुरुष पाण्डुकुमार भी किसी से पराजित होने वाले नहीं हैं। सदा धर्म-कर्म में लगे रहने वाले महाप्रतापी राजा पाण्डु ने वन में रहते हुए भी अपने पितामह के बिखरे हुए वंश का पुनः उद्धार किया है। 27॥   |   mahabharat अध्याय 1.125: ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 125: ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना  »  श्लोक d3-27
 
 
श्लोक  1.125.d3-27 
(नकुल: सहदेवश्च तावप्यमिततेजसौ।
पाण्डवौ नरशार्दूलाविमावप्यपराजितौ॥ )
चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना।
नष्ट: पैतामहो वंश: पाण्डुना पुनरुद्‍धृत:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'उनके नाम नकुल और सहदेव हैं। वे दोनों भी अनन्त तेज से संपन्न हैं। ये महापुरुष पाण्डुकुमार भी किसी से पराजित होने वाले नहीं हैं। सदा धर्म-कर्म में लगे रहने वाले महाप्रतापी राजा पाण्डु ने वन में रहते हुए भी अपने पितामह के बिखरे हुए वंश का पुनः उद्धार किया है। 27॥
 
‘Their names are Nakul and Sahadev. Both of them are also endowed with infinite glory. This great man Pandukumar is also not going to be defeated by anyone. The illustrious king Pandu, who is always engaged in religious activities, while living in the forest, has once again rescued the scattered descendants of his great grandfather. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)