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mahabharat 1.125.8: अपने पुत्रों से सदैव प्रेम करने वाली कुन्ती ने पहले तो महान सुख भोगा था, किन्तु अब संकट में पड़कर वह बहुत लम्बे मार्ग पर चल पड़ी; फिर भी अपने वतन वापस जाने की उत्सुकता के कारण या महर्षियों के योग प्रभाव के कारण वह उस मार्ग को छोटा समझती थी।   |   mahabharat अध्याय 1.125: ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 125: ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.125.8 
सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला।
प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
अपने पुत्रों से सदैव प्रेम करने वाली कुन्ती ने पहले तो महान सुख भोगा था, किन्तु अब संकट में पड़कर वह बहुत लम्बे मार्ग पर चल पड़ी; फिर भी अपने वतन वापस जाने की उत्सुकता के कारण या महर्षियों के योग प्रभाव के कारण वह उस मार्ग को छोटा समझती थी।
 
Kunti, who always loved her sons, had previously enjoyed great happiness, but now, being in trouble, she set out on a very long path; even then, due to her eagerness to go back to her homeland or due to the yogic influence of the great sages, she considered that path to be short.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)