Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.125.22-23: 'कुरुनन्दन भीष्मजी! आपके पुत्र महाराज पाण्डु, जो सम्पूर्ण सांसारिक सुखों का परित्याग करके यहाँ से शतश्रृंग पर्वत पर चले गए थे, वे पुण्यात्मा वहाँ अपनी दोनों पत्नियों के साथ शास्त्रानुसार कुछ समय तक सावधान रहकर, फल-मूल खाते हुए, कठोर तप करते हुए रहे थे। उन्होंने शतश्रृंग में निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों को अपने उत्तम आचरण और तप से संतुष्ट किया था। वहाँ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए महाराज पाण्डु ने किसी दैवीय कारण से स्वयं धर्मराज से इस पुत्र को प्राप्त किया है, जिसका नाम युधिष्ठिर है।॥ 22-23॥ | mahabharat अध्याय 1.125: ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
'कुरुनन्दन भीष्मजी! आपके पुत्र महाराज पाण्डु, जो सम्पूर्ण सांसारिक सुखों का परित्याग करके यहाँ से शतश्रृंग पर्वत पर चले गए थे, वे पुण्यात्मा वहाँ अपनी दोनों पत्नियों के साथ शास्त्रानुसार कुछ समय तक सावधान रहकर, फल-मूल खाते हुए, कठोर तप करते हुए रहे थे। उन्होंने शतश्रृंग में निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों को अपने उत्तम आचरण और तप से संतुष्ट किया था। वहाँ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए महाराज पाण्डु ने किसी दैवीय कारण से स्वयं धर्मराज से इस पुत्र को प्राप्त किया है, जिसका नाम युधिष्ठिर है।॥ 22-23॥
'Kurunandan Bhishmaji! Your son Maharaja Pandu, who had abandoned all worldly pleasures and had gone to Shatashringa mountain from here, that virtuous soul lived there eating roots and fruits, being cautious and performing severe penance with his two wives for some time as per the scriptures. He had satisfied the ascetic sages residing at Shatashringa with his excellent conduct and penance. While observing celibacy there, Maharaja Pandu, due to some divine reason, has received this son from Dharmaraj himself, whose name is Yudhishthira.॥ 22-23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥