अध्याय 125: ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब राजा पाण्डु का प्राणान्त होने वाला था, तब वहाँ निवास करने वाले देवताओं के समान तेजस्वी और मन्त्रों को जानने वाले सभी महर्षियों ने आपस में परामर्श किया।
श्लोक 2: तपस्वी ने कहा: महान और प्रतापी राजा पाण्डु ने अपना राज्य और राष्ट्र त्याग दिया था और तपस्वी ऋषियों के संरक्षण में इस स्थान पर रहकर तपस्या की थी।
श्लोक 3: वे राजा पाण्डु अपनी पत्नी और नवजात पुत्रों को आपके पास जमा करके छोड़कर इस स्थान को छोड़कर स्वर्ग चले गए थे॥3॥
श्लोक 4: उनके इन पुत्रों, पाण्डु और माद्री की अस्थियों तथा उन महाबली राजा की रानी कुन्ती को लेकर हम उनकी राजधानी में चलें। इस समय हमारा यही एकमात्र धर्म प्रतीत होता है॥4॥
श्लोक 5-6: वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! इस प्रकार परस्पर परामर्श करके उन देवतुल्य, उदार और बुद्धिमान सिद्ध महर्षियों ने पाण्डवों को भीष्म और धृतराष्ट्र के हाथों में सौंपने के लिए पाण्डुपुत्रों को आगे करके हस्तिनापुर नगरी में जाने का निश्चय किया।
श्लोक 7: वे सभी तपस्वी ऋषिगण पाण्डु की पत्नी कुन्ती, पांचों पाण्डवों तथा पाण्डु और माद्री की अस्थियों को साथ लेकर उसी क्षण वहां से चले गये।
श्लोक 8: अपने पुत्रों से सदैव प्रेम करने वाली कुन्ती ने पहले तो महान सुख भोगा था, किन्तु अब संकट में पड़कर वह बहुत लम्बे मार्ग पर चल पड़ी; फिर भी अपने वतन वापस जाने की उत्सुकता के कारण या महर्षियों के योग प्रभाव के कारण वह उस मार्ग को छोटा समझती थी।
श्लोक 9: थोड़े ही समय में तेजस्वी स्त्री कुन्ती कुरुजांगल क्षेत्र में पहुँचकर वर्धमान नामक नगर के द्वार पर पहुँची।
श्लोक 10: तब तपस्वी मुनियों ने द्वारपाल से कहा, ‘राजा को हमारे आगमन का समाचार दो।’ द्वारपाल ने क्षण भर में सभा में जाकर समाचार दे दिया।
श्लोक 11: हस्तिनापुर में हजारों भाटों सहित ऋषियों का आगमन सुनकर वहाँ के लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ ॥11॥
श्लोक 12: सूर्योदय के लगभग दो घंटे बाद सभी नागरिक अपनी महिलाओं और बच्चों के साथ तपस्वी ऋषियों के दर्शन के लिए शहर से बाहर आ गए।
श्लोक 13: स्त्रियों के समूह और क्षत्रियों के समूह अनेक वाहनों पर सवार होकर निकले। ब्राह्मणों के साथ उनकी पत्नियाँ भी नगर से बाहर निकलीं॥13॥
श्लोक 14: शूद्रों और वैश्यों की एक विशाल सभा हुई। किसी के मन में ईर्ष्या का भाव नहीं था। सबका मन धर्म में लगा हुआ था॥14॥
श्लोक 15: इसी प्रकार शान्तनुनन्दन भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, प्रज्ञाचक्षु, राजर्षि धृतराष्ट्र, संजय तथा स्वयं विदुरजी भी वहाँ आये। 15॥
श्लोक 16: काशी की राजकुमारी सत्यवती, यशस्विनी कौशल्या और राजपरिवार की स्त्रियों से घिरी हुई गांधारी भी अपने अंतःपुर से वहाँ आईं॥16॥
श्लोक 17: दुर्योधन सहित धृतराष्ट्र के सौ पुत्र विचित्र आभूषणों से सुसज्जित होकर नगर से बाहर आये।
श्लोक 18: उन महर्षियों के दर्शन करके सबने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। फिर पुरोहित सहित सभी कौरव उनके पास बैठ गए।
श्लोक 19: इसी प्रकार नगर और जनपद के सब लोग भूमि पर सिर टेककर प्रणाम करके सब को नमस्कार करके चारों ओर बैठ गए॥19॥
श्लोक 20-21: राजन! वहाँ एकत्रित हुए और शान्त बैठे हुए सब लोगों को देखकर भीष्मजी ने जल आदि से सब ऋषियों का पूजन किया और उनसे अपने राज्य और राष्ट्र का कुशल-क्षेम कहा। तब उन ऋषियों में जो सबसे वृद्ध थे, जटाधारी और मृगचर्मधारी ऋषिगण अन्य सब ऋषियों से अनुमति लेकर इस प्रकार बोले-॥20-21॥
श्लोक 22-23: 'कुरुनन्दन भीष्मजी! आपके पुत्र महाराज पाण्डु, जो सम्पूर्ण सांसारिक सुखों का परित्याग करके यहाँ से शतश्रृंग पर्वत पर चले गए थे, वे पुण्यात्मा वहाँ अपनी दोनों पत्नियों के साथ शास्त्रानुसार कुछ समय तक सावधान रहकर, फल-मूल खाते हुए, कठोर तप करते हुए रहे थे। उन्होंने शतश्रृंग में निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों को अपने उत्तम आचरण और तप से संतुष्ट किया था। वहाँ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए महाराज पाण्डु ने किसी दैवीय कारण से स्वयं धर्मराज से इस पुत्र को प्राप्त किया है, जिसका नाम युधिष्ठिर है।॥ 22-23॥
श्लोक 24: 'इसी प्रकार उस महान राजा को स्वयं वायुदेव ने भीम नामक यह महाबली पुत्र दिया है, जो समस्त बलवानों में श्रेष्ठ है। 24॥
श्लोक 25: 'यह तीसरा पुत्र धनंजय है, जो इन्द्र के अंश से कुन्ती के गर्भ से उत्पन्न हुआ है। इसकी कीर्ति से सभी बड़े-बड़े धनुर्धर इसका तिरस्कार करेंगे। 25॥
श्लोक 26: ‘मद्रीदेवी ने अश्विनीकुमारों से जो दो पुरुष रत्न उत्पन्न किए हैं, वे दोनों महाधनुर्धर पुरुषोत्तम हैं। तुम लोग इन्हें भी देखो॥26॥
श्लोक d3-27: 'उनके नाम नकुल और सहदेव हैं। वे दोनों भी अनन्त तेज से संपन्न हैं। ये महापुरुष पाण्डुकुमार भी किसी से पराजित होने वाले नहीं हैं। सदा धर्म-कर्म में लगे रहने वाले महाप्रतापी राजा पाण्डु ने वन में रहते हुए भी अपने पितामह के बिखरे हुए वंश का पुनः उद्धार किया है। 27॥
श्लोक 28: ‘पाण्डु के पुत्रों का जन्म, उनकी वृद्धि और वेदों का अध्ययन आदि देखकर आप लोग सदैव अत्यन्त प्रसन्न रहेंगे ॥28॥
श्लोक 29: 'राजा पाण्डु ने मुनियों की आचार-संहिता का पालन करते हुए उत्तम पुत्रों को प्राप्त करके सत्रह दिन पूर्व पितृलोक को प्रस्थान किया।
श्लोक 30: जब उन्हें चिता पर लिटाकर अग्नि में होम दिया गया, तो देवी माद्री ने जीवन के प्रति अपनी आसक्ति त्याग दी और उसी अग्नि में प्रवेश कर गईं।
श्लोक 31: 'वह पतिव्रता स्त्री राजा पाण्डु के साथ पतिलोक को चली गई। अब तुम लोग माद्री और पाण्डु के लिए जो उचित समझो, वैसा करो।॥31॥
श्लोक d4-32: ‘आप शरण में आए हुए कुन्ती तथा प्रतापी पाण्डवों को स्वीकार करें और उनका यथोचित उपकार करें; क्योंकि यही सनातन धर्म है। ये पाण्डु और माद्री की अस्थियाँ हैं और ये उनके श्रेष्ठ पुत्र हैं, जिनमें शत्रुओं को संताप देने की शक्ति है। माद्री और पाण्डु का श्राद्ध करने के साथ-साथ आप इन पुत्रों का भी उनकी माता सहित उपकार करें।॥32॥
श्लोक 33: ‘सपिण्डीकरण के पश्चात् प्रेतकर्म समाप्त हो जाने पर, कुरुवंश के महापुरुष और समस्त धर्मों के ज्ञाता पाण्डु के पितृमेध (यज्ञ) का भी लाभ प्राप्त करना चाहिए।’ 33॥
श्लोक 34: वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! समस्त कौरवों से ऐसा कहकर उनके देखते ही देखते गुह्यकों सहित समस्त तपस्वी ऋषिगण क्षण भर में वहाँ से अदृश्य हो गये।
श्लोक 35-d5: महर्षियों और सिद्धों के समूह को इस प्रकार गन्धर्वों के नगर के समान अदृश्य होते देख, सब कौरव सहसा उछल पड़े और “साधु-साधु” कहते हुए अत्यन्त विस्मित हो गए ॥35॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥