श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण  »  श्लोक d48-29
 
 
श्लोक  1.124.d48-29 
बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी॥
अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते।
भर्त्रा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि॥
संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथा: शाश्वती: समा:॥ )
राज्ञ: शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम्।
दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तब यशस्वी कुन्ती ने अश्रुपूरित स्वर में कहा— ‘कल्याणी! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी है। हे विशाल नेत्रों वाली! आज ही स्वर्ग में तुम अपने पति से मिलो। भामिनी! तुम स्वर्ग में अपने पति से मिलो और अनंत वर्षों तक सुखी रहो।’ माद्री ने कहा— ‘मेरे इस शरीर को राजा के शरीर के साथ ही अच्छी तरह से ढककर दाह संस्कार किया जाए। बड़ी बहन! कृपया मेरा यह प्रिय कार्य करो।’
 
Then the glorious Kunti said in a voice full of tears— 'Kalyani! I have given you the order. Huge-eyed one! May you meet your husband in heaven today itself. Bhaamini! May you meet your husband in heaven and remain happy for infinite years.' Madri said— 'This body of mine should be covered properly and cremated along with the body of the king. Elder sister! Please do this favourite work of mine.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)