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mahabharat 1.124.d4-d8: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! माद्री के ये वचन सुनकर शोक से विह्वल कुन्ती सहसा जड़ से कटे वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ी और गिरते ही मूर्छित होकर निश्चल पड़ी रही, हिलने-डुलने में असमर्थ हो गई थी। वह अचेत हो गई थी। माद्री ने उसे उठाकर कहा- 'बहन! आओ, आओ!' ऐसा कहकर उसने कुन्ती को कुरुराज पाण्डु का दर्शन कराया। कुन्ती उठकर पुनः राजा पाण्डु के चरणों पर गिर पड़ी। राजा के मुख पर मुस्कान थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे अभी कुछ कहने वाले हैं। उस समय कुन्ती ने प्रेमवश उन्हें हृदय से लगा लिया और विलाप करने लगी। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गई थीं। इसी प्रकार माद्री भी राजा को गले लगाकर शोक से विलाप करने लगी।   |   mahabharat अध्याय 1.124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण  »  श्लोक d4-d8
 
 
श्लोक  1.124.d4-d8 
वैशम्पायन उवाच
(तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कुन्ती शोकाग्नितापिता।
पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुम:॥
निश्चेष्टा पतिता भूमौ मोहान्नैव चचाल सा॥
कुन्तीमुत्थाप्य माद्री च मोहेनाविष्टचेतनाम्।
एह्येहीति तां कुन्तीं दर्शयामास कौरवम्॥
पादयो: पतिता कुन्ती पुनरुत्थाय भूमिपम्।
सस्मितेन तु वक्त्रेण गदन्तमिव भारत।
परिरभ्य तदा मोहाद् विललापाकुलेन्द्रिया॥
माद्री चापि समालिङ्गॺ राजानं विललाप सा॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! माद्री के ये वचन सुनकर शोक से विह्वल कुन्ती सहसा जड़ से कटे वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ी और गिरते ही मूर्छित होकर निश्चल पड़ी रही, हिलने-डुलने में असमर्थ हो गई थी। वह अचेत हो गई थी। माद्री ने उसे उठाकर कहा- 'बहन! आओ, आओ!' ऐसा कहकर उसने कुन्ती को कुरुराज पाण्डु का दर्शन कराया। कुन्ती उठकर पुनः राजा पाण्डु के चरणों पर गिर पड़ी। राजा के मुख पर मुस्कान थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे अभी कुछ कहने वाले हैं। उस समय कुन्ती ने प्रेमवश उन्हें हृदय से लगा लिया और विलाप करने लगी। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गई थीं। इसी प्रकार माद्री भी राजा को गले लगाकर शोक से विलाप करने लगी।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! On hearing these words of Madri, Kunti, overwhelmed with grief, suddenly fell on the earth like a tree cut from its roots and as soon as she fell, she fell unconscious and lay motionless, unable to move. She had become unconscious. Madri lifted her up and said- 'Sister! Come, come!' Saying this, she showed Kunti the Kuru King Pandu. Kunti got up and fell at the feet of King Pandu again. There was a smile on the face of the King and it seemed as if he was going to say something just now. At that time, Kunti embraced him in her heart out of love and started wailing. All her senses had become restless. Similarly, Madri also embraced the King and started wailing in sorrow.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)