श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण  »  श्लोक d12-d16
 
 
श्लोक  1.124.d12-d16 
कुन्त्युवाच
हा राजन् कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम्॥
हा राजन् मम मन्दाया: कथं माद्रीं समेत्य वै।
निधनं प्राप्तवान् राजन् मद्भाग्यपरिसंक्षयात्॥
युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ।
कस्य हित्वा प्रियान् पुत्रान् प्रयातोऽसि विशाम्पते॥
नूनं त्वां त्रिदशा देवा: प्रतिनन्दन्ति भारत।
यथा हि तप उग्रं ते चरितं विप्रसंसदि॥
आवाभ्यां सहितो राजन् गमिष्यसि दिवं शुभम्।
आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम्॥
 
 
अनुवाद
कुन्ती बोली - हाँ! महाराज! आप हम दोनों को किसके हवाले करके स्वर्ग जा रहे हैं? हाय! मैं कितनी अभागिनी हूँ। मेरे राजन! माद्री से अकेले मिलकर आप अचानक मृत्यु के मुख में क्यों चले गये? मेरे नष्ट हुए भाग्य के कारण ही मुझे आज यह दिन देखना पड़ रहा है। प्रजानाथ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेव - इन प्रिय पुत्रों को किसके भरोसे छोड़कर आप चले गये? भरत! अवश्य ही देवता आपका स्वागत कर रहे होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणों के समूह में रहकर घोर तपस्या की है। अजमीढ़कुल के पुत्र! आपके पूर्वजों ने पुण्य कर्मों से जिस गति को प्राप्त किया है, आप हम दोनों पत्नियों के साथ उसी शुभ स्वर्ग गति को प्राप्त करेंगे।
 
Kunti said - Yes! Maharaj! Who are you handing over both of us to and going to heaven. Alas! How unfortunate I am. My king! Why did you suddenly go to the jaws of death after meeting Madri alone? It is because of my ruined fortune that I have to see this day today. Prajanath! Yudhishthira, Bhimsen, Arjun and Nakul-Sahdev - in whose care did you leave these beloved sons and go? Bharat! Surely the gods must be welcoming you; because you have performed severe penance by living in the group of Brahmins. Son of Ajamidhkul! The state that your ancestors have attained through pious deeds, you will attain the same auspicious heavenly state with both of us wives.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)