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mahabharat 1.124.31: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुन्ती से ऐसा कहकर पाण्डुकी की यशस्वी पत्नी माद्री स्वयं चिता पर रखे हुए पुरुषोत्तम पाण्डु के मृत शरीर के साथ चिता पर बैठ गईं॥31॥   |   mahabharat अध्याय 1.124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.124.31 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम्।
मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुन्ती से ऐसा कहकर पाण्डुकी की यशस्वी पत्नी माद्री स्वयं चिता पर रखे हुए पुरुषोत्तम पाण्डु के मृत शरीर के साथ चिता पर बैठ गईं॥31॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Saying this to Kunti, Panduki's famous wife Madri herself sat on the pyre along with the dead body of Pandu, the best of men, kept on the pyre of Chitaki. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)