श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण  »  श्लोक 23-25h
 
 
श्लोक  1.124.23-25h 
कुन्त्युवाच
अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम।
अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय॥ २३॥
अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम्।
उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान्॥ २४॥
अवाप्य पुत्राँल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये।
 
 
अनुवाद
कुन्ती बोली- माद्री! मैं उनकी ज्येष्ठ पत्नी हूँ, अतः धर्म के ज्येष्ठ फल की अधिकारी हूँ। मुझे जो अवश्यम्भावी है, उसे करने से मत रोको। मैं मृत्यु के वश में पड़े अपने पति का अनुसरण करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बालकों का पालन करो। पुत्र प्राप्ति से मेरी सांसारिक इच्छा पूरी हो गई है; अब मैं अपने पति के साथ जलकर वीरांगना का पद प्राप्त करना चाहती हूँ।॥ 23-24॥
 
Kunti said— Madri! I am his eldest wife, hence I have the right to the eldest fruit of Dharma. Do not stop me from doing what is inevitable. I will follow my husband who is in the grip of death. Now you leave them and get up and take care of these children. My worldly desire has been fulfilled by getting sons; now I want to burn myself with my husband and attain the position of a brave wife.॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)