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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 124: राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.124.20 
कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम्।
तं विचिन्तयत: शापं प्रहर्ष: समजायत॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'वह उस शाप का विचार करके सदैव दुःखी और उदास रहता था, फिर आपको अकेला पाकर उसके हृदय में कामजनित हर्ष कैसे उत्पन्न हो गया?॥20॥
 
'He always remained sad and depressed thinking about that curse, then how did the joy born of lust arise in his heart on finding you alone?॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)