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mahabharat 1.123.d7-d8: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसुदेव ने पुरोहित को भेजा; उसके साथ उन राजकुमारों के लिए अनेक प्रकार के उपयोगी वस्त्र और आभूषण भी भेजे। कुन्ती और माद्री के लिए भी दासियाँ, दासियाँ, वस्त्र-आभूषण आदि, गौएँ, चाँदी और सोना भेजा।   |   mahabharat अध्याय 1.123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार  »  श्लोक d7-d8
 
 
श्लोक  1.123.d7-d8 
वैशम्पायन उवाच
वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम्।
युक्तानि च कुमाराणां पारिबर्हाण्यनेकश:॥
कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम्।
गाश्च रौप्यं हिरण्यं च प्रेषयामास भारत॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसुदेव ने पुरोहित को भेजा; उसके साथ उन राजकुमारों के लिए अनेक प्रकार के उपयोगी वस्त्र और आभूषण भी भेजे। कुन्ती और माद्री के लिए भी दासियाँ, दासियाँ, वस्त्र-आभूषण आदि, गौएँ, चाँदी और सोना भेजा।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Then saying 'very good' Vasudev sent the priest; along with him he also sent many kinds of useful clothes and ornaments for those princes. For Kunti and Madri also he sent maid servants, slaves, clothes and ornaments etc., cows, silver and gold.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)