Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.123.d17-d20: भीमसेन गदा चलाने में और युधिष्ठिर तोमर चलाने में निपुण हो गये। धीर और पराक्रमी पुरुषों में श्रेष्ठ माद्री के दोनों पुत्र ढाल और तलवार चलाने की कला में निपुण हो गये। परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेद के प्रख्यात विद्वान हुए। राजन! जब दानवीरों में श्रेष्ठ शुकने को यह ज्ञात हुआ कि अर्जुन धनुर्वेद में उनके समान ही पारंगत हो गये हैं, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अर्जुन को शक्ति, तलवार, बाण, ताड़ के वृक्ष के समान विशाल और कांतिमान धनुष तथा विपात, क्षुर और नाराच प्रदान किये। विपात आदि सब प्रकार के बाण गिद्ध के पंखों से सुशोभित थे। वे बड़े-बड़े सर्पों के समान प्रतीत होते थे। ये सब अस्त्र-शस्त्र पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा कि पृथ्वी पर कोई भी राजा तेज में उनकी बराबरी नहीं कर सकता।   |   mahabharat अध्याय 1.123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार  »  श्लोक d17-d20
 
 
श्लोक  1.123.d17-d20 
गदायां पारगो भीमस्तोमरेषु युधिष्ठिर:।
असिचर्मणि निष्णातौ यमौ सत्त्ववतां वरौ॥
धनुर्वेदे गत: पारं सव्यसाची परंतप:।
शुकेन समनुज्ञातो मत्समोऽयमिति प्रभो।
अनुज्ञाय ततो राजा शक्तिं खड्गं तथा शरान्॥
धनुश्च ददतां श्रेष्ठस्तालमात्रं महाप्रभम्।
विपाठक्षुरनाराचान् गृध्रपत्रानलंकृतान्॥
ददौ पार्थाय संहृष्टो महोरगसमप्रभान्।
अवाप्य सर्वशस्त्राणि मुदितो वासवात्मज:॥
मेने सर्वान् महीपालान् अपर्याप्तान् स्वतेजस:।
 
 
अनुवाद
भीमसेन गदा चलाने में और युधिष्ठिर तोमर चलाने में निपुण हो गये। धीर और पराक्रमी पुरुषों में श्रेष्ठ माद्री के दोनों पुत्र ढाल और तलवार चलाने की कला में निपुण हो गये। परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेद के प्रख्यात विद्वान हुए। राजन! जब दानवीरों में श्रेष्ठ शुकने को यह ज्ञात हुआ कि अर्जुन धनुर्वेद में उनके समान ही पारंगत हो गये हैं, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अर्जुन को शक्ति, तलवार, बाण, ताड़ के वृक्ष के समान विशाल और कांतिमान धनुष तथा विपात, क्षुर और नाराच प्रदान किये। विपात आदि सब प्रकार के बाण गिद्ध के पंखों से सुशोभित थे। वे बड़े-बड़े सर्पों के समान प्रतीत होते थे। ये सब अस्त्र-शस्त्र पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा कि पृथ्वी पर कोई भी राजा तेज में उनकी बराबरी नहीं कर सकता।
 
Bhimsen became adept in mace handling and Yudhishthir in throwing Tomar. Both the sons of Madri, the best among patient and powerful men, became adept in the art of using shield and sword. Parantap Savyasachi Arjun became a renowned scholar of Dhanurveda. Rajan! When Shukne, the best among the givers, came to know that Arjun had become as knowledgeable in Dhanurveda as he was, then he became very happy and gave Shakti, sword, arrows, a bow as huge and shining like a palm tree and Vipath, Kshur and Narach to Arjun. All types of arrows like Vipatha etc. were decorated with vulture's wings. They looked like big snakes. Indra's son Arjun was very happy after receiving all these weapons. He began to feel that no king on earth could match him in glory.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)