Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.123.d1-d5: शतश्रृंग में निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों ने पाण्डु के पुत्रों को जन्म से ही अपने संरक्षण में ले लिया और उन्हें अपने पुत्रों के समान लाड़-प्यार किया। उधर द्वारका में वसुदेव और सभी वृष्णिवंशी राजा पाण्डु के विषय में इस प्रकार विचार कर रहे थे- 'हे! किंदम मुनि के शाप से भयभीत राजा पाण्डु शतश्रृंग पर्वत पर चले गए हैं और वहाँ ऋषि-मुनियों के साथ तपस्या करके पूर्ण तपस्वी बन गए हैं। वे शाक, मूल और फल खाते हैं, तपस्या में लीन रहते हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सदैव ध्यान का अभ्यास करते हैं। अनेक दूत ये बातें बता रहे थे।' यह समाचार सुनकर प्रायः सभी यदुवंशी, जो उनके प्रेमी थे, शोक में डूब गए। वे सोचते रहते थे- 'राजा पाण्डु से शुभ समाचार कब सुनने को मिलेगा?' एक दिन सभी वृष्णिवंशी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ बैठकर पाण्डु के विषय में इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय उन्हें पाण्डु के पुत्र होने का समाचार मिला। यह सुनकर वे सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और परस्पर सद्भावना प्रकट करते हुए वसुदेवजी से इस प्रकार बोले- | mahabharat अध्याय 1.123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
शतश्रृंग में निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों ने पाण्डु के पुत्रों को जन्म से ही अपने संरक्षण में ले लिया और उन्हें अपने पुत्रों के समान लाड़-प्यार किया। उधर द्वारका में वसुदेव और सभी वृष्णिवंशी राजा पाण्डु के विषय में इस प्रकार विचार कर रहे थे- 'हे! किंदम मुनि के शाप से भयभीत राजा पाण्डु शतश्रृंग पर्वत पर चले गए हैं और वहाँ ऋषि-मुनियों के साथ तपस्या करके पूर्ण तपस्वी बन गए हैं। वे शाक, मूल और फल खाते हैं, तपस्या में लीन रहते हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सदैव ध्यान का अभ्यास करते हैं। अनेक दूत ये बातें बता रहे थे।' यह समाचार सुनकर प्रायः सभी यदुवंशी, जो उनके प्रेमी थे, शोक में डूब गए। वे सोचते रहते थे- 'राजा पाण्डु से शुभ समाचार कब सुनने को मिलेगा?' एक दिन सभी वृष्णिवंशी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ बैठकर पाण्डु के विषय में इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय उन्हें पाण्डु के पुत्र होने का समाचार मिला। यह सुनकर वे सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और परस्पर सद्भावना प्रकट करते हुए वसुदेवजी से इस प्रकार बोले-
The ascetic sages residing in Shatashringa took Pandu's sons under their protection from birth and pampered them like their own sons. On the other hand, in Dwarka, Vasudev and all the Vrishnivanshis were thinking about King Pandu in this way - 'Oh! King Pandu, frightened by the curse of Kindam Muni, has gone to Shatashringa mountain and has become a complete ascetic by doing penance with the sages and saints there. He eats vegetables, roots and fruits, remains engaged in penance, keeps his senses under control and always practices meditation. Many messengers were telling these things.' On hearing this news, almost all the Yaduvanshis, being his lovers, were immersed in grief. They used to think—‘When will we get to hear the good news from King Pandu?’ One day all the Vrishnivanshis were sitting with their brothers and relatives and were talking about Pandu in this manner, at that time they heard the news of Pandu having a son. On hearing this, all of them became overjoyed and expressing mutual goodwill, spoke to Vasudevji in this manner—
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥