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mahabharat 1.123.9-10: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब राजा पाण्डु ने एकान्त में कुन्ती से यह कहा - 'हे कल्याणी! ऐसा कर्म करो जिससे मेरी कुल परम्परा खंडित न हो और वह सम्पूर्ण जगत को प्रिय हो। ऐसा परम शुभ कर्म करो जिससे मेरे और तुम्हारे पितरों के लिए तर्पण की कोई कमी न हो और वह मुझे भी प्रिय हो।॥ 9-10॥   |   mahabharat अध्याय 1.123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  1.123.9-10 
वैशम्पायन उवाच
तत: कुन्तीं पुन: पाण्डुर्विविक्त इदमब्रवीत्।
कुलस्य मम संतानं लोकस्य च कुरु प्रियम्॥ ९॥
मम चापिण्डनाशाय पूर्वेषामपि चात्मन:।
मत्प्रियार्थं च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब राजा पाण्डु ने एकान्त में कुन्ती से यह कहा - 'हे कल्याणी! ऐसा कर्म करो जिससे मेरी कुल परम्परा खंडित न हो और वह सम्पूर्ण जगत को प्रिय हो। ऐसा परम शुभ कर्म करो जिससे मेरे और तुम्हारे पितरों के लिए तर्पण की कोई कमी न हो और वह मुझे भी प्रिय हो।॥ 9-10॥
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Then king Pandu said this to Kunti in private - 'O Kalyani! Do such a deed that my family tradition is not broken and is loved by the whole world. Do such a supremely auspicious deed that there is no dearth of offerings for me and your ancestors and that is loved by me as well.॥ 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)