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mahabharat 1.123.7: पाण्डु बोले - माद्री ! यह बात मेरे मन में भी घूमती रहती है, किन्तु इस विषय में तुमसे कुछ कहने का साहस मुझमें नहीं हुआ; क्योंकि मैं नहीं जानता कि यह प्रस्ताव सुनकर तुम प्रसन्न होओगी या दुःखी। यह संदेह सदैव बना रहता था।   |   mahabharat अध्याय 1.123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.123.7 
पाण्डुरुवाच
ममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थ: परिवर्तते।
न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया॥ ७॥
 
 
अनुवाद
पाण्डु बोले - माद्री ! यह बात मेरे मन में भी घूमती रहती है, किन्तु इस विषय में तुमसे कुछ कहने का साहस मुझमें नहीं हुआ; क्योंकि मैं नहीं जानता कि यह प्रस्ताव सुनकर तुम प्रसन्न होओगी या दुःखी। यह संदेह सदैव बना रहता था।
 
Pandu said - Madri! This matter also keeps on revolving in my mind, but I did not have the courage to say anything to you about this matter; because I do not know whether you will be happy or upset on hearing this proposal. This doubt always remained.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)