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mahabharat 1.123.2-3: हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले निष्पाप कुरुपुत्र! तुममें सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो गई है। तुम्हारी इस न्यूनता या दुर्बलता का मुझे कोई शोक नहीं है। यद्यपि कुन्तीदेवी से श्रेष्ठ होने के कारण मैं सदैव प्रधान रानी के सिंहासन पर बैठने का अधिकारी था, तथापि मुझे सदैव छोटी रानी के रूप में रहने का कोई शोक नहीं है। हे राजन! गांधारी और राजा धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए हैं, यह समाचार सुनकर भी मुझे ऐसा शोक नहीं हुआ॥ 2-3॥   |   mahabharat अध्याय 1.123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  1.123.2-3 
न मेऽस्ति त्वयि संतापो विगुणेऽपि परंतप।
नावरत्वे वरार्हाया: स्थित्वा चानघ नित्यदा॥ २॥
गान्धार्याश्चैव नृपते जातं पुत्रशतं तथा।
श्रुत्वा न मे तथा दु:खमभवत् कुरुनन्दन॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले निष्पाप कुरुपुत्र! तुममें सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो गई है। तुम्हारी इस न्यूनता या दुर्बलता का मुझे कोई शोक नहीं है। यद्यपि कुन्तीदेवी से श्रेष्ठ होने के कारण मैं सदैव प्रधान रानी के सिंहासन पर बैठने का अधिकारी था, तथापि मुझे सदैव छोटी रानी के रूप में रहने का कोई शोक नहीं है। हे राजन! गांधारी और राजा धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए हैं, यह समाचार सुनकर भी मुझे ऐसा शोक नहीं हुआ॥ 2-3॥
 
'O sinless son of Kuru, who torments his enemies! You have lost the power to produce children. I have no sorrow for this deficiency or weakness of yours. Although I was always entitled to sit on the throne of the chief queen due to being superior to Kuntidevi, yet I have no sorrow for always having to live as the younger one. O King! I did not feel such sorrow even after hearing the news that Gandhari and King Dhritarashtra have had hundred sons.॥ 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)