अध्याय 123: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! जब कुन्ती के तीन पुत्र हुए और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए, तब माद्री ने एकान्त में पाण्डु से कहा:॥1॥
श्लोक 2-3: हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले निष्पाप कुरुपुत्र! तुममें सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो गई है। तुम्हारी इस न्यूनता या दुर्बलता का मुझे कोई शोक नहीं है। यद्यपि कुन्तीदेवी से श्रेष्ठ होने के कारण मैं सदैव प्रधान रानी के सिंहासन पर बैठने का अधिकारी था, तथापि मुझे सदैव छोटी रानी के रूप में रहने का कोई शोक नहीं है। हे राजन! गांधारी और राजा धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए हैं, यह समाचार सुनकर भी मुझे ऐसा शोक नहीं हुआ॥ 2-3॥
श्लोक 4: 'परन्तु मुझे इस बात का बड़ा दुःख है कि मैं और कुन्ती देवी दोनों ही आपकी पत्नियाँ हैं, फिर भी उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जबकि मैं निःसंतान रही। यह सौभाग्य की बात है कि इस समय मेरे प्रियतम को कुन्ती के गर्भ से पुत्र प्राप्त हुआ है।
श्लोक 5: 'यदि कुन्तीराजकुमारी मेरे गर्भ से सन्तान उत्पन्न कर सके तो यह मेरा बड़ा उपकार होगा और तुम्हारा भी कल्याण होगा॥5॥
श्लोक 6: 'आपकी सहपत्नी होने के कारण मेरे हृदय में एक प्रकार का अभिमान है, जो मुझे कुन्तीदेवी से कुछ मांगने में बाधा डाल रहा है; अतः यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो आप ही मेरे लिए कुन्तीदेवी को प्रेरित करें।'॥6॥
श्लोक 7: पाण्डु बोले - माद्री ! यह बात मेरे मन में भी घूमती रहती है, किन्तु इस विषय में तुमसे कुछ कहने का साहस मुझमें नहीं हुआ; क्योंकि मैं नहीं जानता कि यह प्रस्ताव सुनकर तुम प्रसन्न होओगी या दुःखी। यह संदेह सदैव बना रहता था।
श्लोक 8: परंतु आज इस विषय में आपकी बात सुनकर अब मैं इसके लिए प्रयत्न करूँगा। मुझे विश्वास है कि कुन्तीदेवी मेरी बात अवश्य मान लेंगी। ॥8॥
श्लोक 9-10: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब राजा पाण्डु ने एकान्त में कुन्ती से यह कहा - 'हे कल्याणी! ऐसा कर्म करो जिससे मेरी कुल परम्परा खंडित न हो और वह सम्पूर्ण जगत को प्रिय हो। ऐसा परम शुभ कर्म करो जिससे मेरे और तुम्हारे पितरों के लिए तर्पण की कोई कमी न हो और वह मुझे भी प्रिय हो।॥ 9-10॥
श्लोक 11: 'अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिए तुम्हें अत्यन्त कठिन कर्म करने होंगे, जैसे स्वर्ग का राज्य पाकर भी इन्द्र ने कीर्ति प्राप्त करने के लिए ही अनेक यज्ञ किए थे।॥ 11॥
श्लोक 12: ‘भामिनी! मन्त्रों में निपुण ब्राह्मण अत्यन्त कठोर तप करके भी यश के लिए गुरुओं की शरण लेते हैं।’ 12॥
श्लोक 13: ‘समस्त राजाओं और तपस्वी ब्राह्मणों ने भी यश के लिए छोटे-बड़े कठिन कर्म किए हैं।॥13॥
श्लोक 14: 'अनिंदिते! इसी प्रकार तुम इस माद्री को भी नाव में बिठाकर पार ले जाओ; इसे संतान दो और महान यश प्राप्त करो।'॥14॥
श्लोक 15: वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! राजा पाण्डु की यह बात सुनकर कुन्ती ने माद्री से कहा, 'एक बार किसी देवता का ध्यान करो, उसके द्वारा तुम्हें योग्य सन्तान की प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है।'
श्लोक 16: तब माद्री ने कुछ सोचकर उन दोनों अश्विनीकुमारों का स्मरण किया और उन दोनों ने आकर माद्री के गर्भ से जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न किए॥16॥
श्लोक 17: उनमें से एक का नाम नकुल और दूसरे का नाम सहदेव था। पृथ्वी पर उनकी सुन्दरता के समान कोई दूसरा नहीं था। पहले की भाँति आकाशवाणी हुई कि उन दोनों यामल बालकों के विषय में भी -॥17॥
श्लोक 18: ये दोनों बालक अश्विनीकुमारों से भी अधिक बुद्धिमान, सुन्दर और गुणों से युक्त होंगे। ये अपनी प्रभा और महान सौन्दर्य से सदैव प्रकाशित होंगे।॥18॥
श्लोक 19: तत्पश्चात् शतश्रृंग में निवास करने वाले ऋषियों ने उन सबका नामकरण संस्कार किया और उन्हें आशीर्वाद देकर उनकी भक्ति और कर्म के अनुसार उनके नाम रखे॥19॥
श्लोक 20: कुंती के सबसे बड़े पुत्र का नाम युधिष्ठिर, बीच वाले का नाम भीमसेन और तीसरे का नाम अर्जुन था।
श्लोक 21: उन प्रसन्न ब्राह्मणों ने माद्री के पुत्रों में से प्रथम का नाम नकुल तथा दूसरे का नाम सहदेव रखने का निश्चय किया।
श्लोक 22: वे कौरव श्रेष्ठ पाण्डव प्रतिवर्ष एक-एक करके जन्म लेते थे, फिर भी दिव्य स्वभाव के होने के कारण वे एक के बाद एक पाँच संवत्सरों के समान सुन्दर लगते थे।
श्लोक 23-25: वे सभी बड़े धैर्यवान, वीर्यवान, महान बलवान और पराक्रमी थे । उन महान् तेजस्वी देवरूपधारी पुत्रों को देखकर महाराज पाण्डु को बड़ी प्रसन्नता हुई । वे आनन्द में मग्न हो गए । वे सभी बालक शतश्रृंग में रहने वाले समस्त ऋषियों और ऋषिपत्नियों को प्रिय थे । तत्पश्चात् पाण्डु ने पुनः कुन्ती को माद्री से सन्तान उत्पन्न करने के लिए प्रेरित किया । 23-25॥
श्लोक 26: राजन! जब पाण्डु ने कुन्ती को एकान्त में यह बात बताई, तब पतिव्रता कुन्ती ने पाण्डु से इस प्रकार कहा - 'महाराज! मैंने इसे एक पुत्र के लिए नियुक्त किया था, परन्तु इसने दो पुत्र प्राप्त कर लिए। मैं इसके द्वारा छली गई हूँ।'
श्लोक 27-29: 'अब मुझे भय है कि कहीं इससे मेरा अपमान न हो जाए। दुष्ट स्त्रियों का यही हश्र होता है। मैं ऐसी मूर्ख हूँ कि यह न समझ सकी कि दो देवताओं का आह्वान करने से दो पुत्रों का फल प्राप्त होता है। अतः हे राजन! अब मुझे इस कार्य में नियुक्त न करें। मैं आपसे यह वर माँगती हूँ।' इस प्रकार पाण्डु को देवताओं द्वारा प्रदत्त पाँच अत्यन्त पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुए, जो न केवल यशस्वी थे, अपितु कुरुवंश का भी गौरव बढ़ाने वाले तथा उत्तम लक्षणों से युक्त थे। चन्द्रमा के समान सभी लोग उन्हें देखना पसन्द करते थे।
श्लोक 30-31: उनका गौरव सिंह के समान था, वे विशाल धनुष धारण किए हुए थे। उनकी चाल भी सिंह के समान थी। देवताओं के समान वीर और सिंह के समान गर्दन वाले वे महापुरुष बढ़ने लगे। उस पवित्र हिमालय की चोटी पर पले-बढ़े और बलवान होकर, वे पाण्डु पुत्र वहाँ एकत्रित होने वाले महर्षियों को चकित कर देते थे।
श्लोक d1-d5: शतश्रृंग में निवास करने वाले तपस्वी ऋषियों ने पाण्डु के पुत्रों को जन्म से ही अपने संरक्षण में ले लिया और उन्हें अपने पुत्रों के समान लाड़-प्यार किया। उधर द्वारका में वसुदेव और सभी वृष्णिवंशी राजा पाण्डु के विषय में इस प्रकार विचार कर रहे थे- 'हे! किंदम मुनि के शाप से भयभीत राजा पाण्डु शतश्रृंग पर्वत पर चले गए हैं और वहाँ ऋषि-मुनियों के साथ तपस्या करके पूर्ण तपस्वी बन गए हैं। वे शाक, मूल और फल खाते हैं, तपस्या में लीन रहते हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सदैव ध्यान का अभ्यास करते हैं। अनेक दूत ये बातें बता रहे थे।' यह समाचार सुनकर प्रायः सभी यदुवंशी, जो उनके प्रेमी थे, शोक में डूब गए। वे सोचते रहते थे- 'राजा पाण्डु से शुभ समाचार कब सुनने को मिलेगा?' एक दिन सभी वृष्णिवंशी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ बैठकर पाण्डु के विषय में इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय उन्हें पाण्डु के पुत्र होने का समाचार मिला। यह सुनकर वे सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और परस्पर सद्भावना प्रकट करते हुए वसुदेवजी से इस प्रकार बोले-
श्लोक d6: वृष्णियों ने कहा, "हे महामना वसुदेव! हम चाहते हैं कि राजा पाण्डु के पुत्र आचरणहीन न हों; अतः पाण्डु के कल्याण को ध्यान में रखते हुए आप उनके पास एक पुरोहित भेजने की कृपा करें।"
श्लोक d7-d8: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसुदेव ने पुरोहित को भेजा; उसके साथ उन राजकुमारों के लिए अनेक प्रकार के उपयोगी वस्त्र और आभूषण भी भेजे। कुन्ती और माद्री के लिए भी दासियाँ, दासियाँ, वस्त्र-आभूषण आदि, गौएँ, चाँदी और सोना भेजा।
श्लोक d9-d10: वह सब सामग्री एकत्रित करके पुरोहित वन को चले गए। शत्रुओं के नगर को जीतकर राजा पाण्डु ने पुरोहित द्विजश्रेष्ठ काश्यप की विधिपूर्वक पूजा की। कुन्ती और माद्री प्रसन्न हुईं और उन्होंने वसुदेवजी की भूरि-भूरि स्तुति की।
श्लोक d11-d12: तब पाण्डु ने अपने पुत्रों के गर्भाधान से लेकर चूड़ाकरण और उपनयन तक के सभी संस्कार सम्पन्न करवाए। भरत! पुरोहित कश्यप ने उनके सभी संस्कार सम्पन्न कराए। बैल के समान विशाल नेत्रों वाले उन यशस्वी पाण्डवों ने चूड़ाकरण और उपनयन के पश्चात उपाकर्म किया और वेदों का अध्ययन आरम्भ किया तथा उसमें पारंगत हो गए।
श्लोक d13-d16: भरत! शर्याति के वंश में पृषत् नामक एक पुत्र हुआ, जिसका नाम शुक था। वह अपने पराक्रम से शत्रुओं को त्रास देता था। एक बार शुक ने अपने धनुष के बल से समुद्र पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। अश्वमेध आदि सौ बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करके तथा समस्त देवताओं और पितरों का पूजन करके परम बुद्धिमान महात्मा राजा शुक शतश्रृंग पर्वत पर आकर शाक, फल और मूल खाकर तपस्या करने लगे। उन्हीं तपस्वी राजा ने उत्तम उपकरणों और शिक्षा द्वारा पाण्डवों की योग्यता बढ़ाई। राजा शुक के आशीर्वाद से सभी पाण्डव धनुर्वेद में पारंगत हो गए।
श्लोक d17-d20: भीमसेन गदा चलाने में और युधिष्ठिर तोमर चलाने में निपुण हो गये। धीर और पराक्रमी पुरुषों में श्रेष्ठ माद्री के दोनों पुत्र ढाल और तलवार चलाने की कला में निपुण हो गये। परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेद के प्रख्यात विद्वान हुए। राजन! जब दानवीरों में श्रेष्ठ शुकने को यह ज्ञात हुआ कि अर्जुन धनुर्वेद में उनके समान ही पारंगत हो गये हैं, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अर्जुन को शक्ति, तलवार, बाण, ताड़ के वृक्ष के समान विशाल और कांतिमान धनुष तथा विपात, क्षुर और नाराच प्रदान किये। विपात आदि सब प्रकार के बाण गिद्ध के पंखों से सुशोभित थे। वे बड़े-बड़े सर्पों के समान प्रतीत होते थे। ये सब अस्त्र-शस्त्र पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा कि पृथ्वी पर कोई भी राजा तेज में उनकी बराबरी नहीं कर सकता।
श्लोक d21: पांडवों की आयु में एक वर्ष का अंतर था। दोनों देवियों कुंती और माद्री के पुत्र दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगे।
श्लोक 32: फिर जैसे कमल जल में बढ़ता है, वैसे ही कुरुवंश की वृद्धि के लिए जो एक सौ पाँच बालक उत्पन्न हुए, वे सब-के-सब थोड़े ही समय में बड़े होकर परिपक्व हो गए ॥32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥