श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 122: युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनकी उत्पत्ति  »  श्लोक d1-11
 
 
श्लोक  1.122.d1-11 
प्राहु: क्षत्रं बलज्येष्ठं बलज्येष्ठं सुतं वृणु।
(अश्वमेध: क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिश्श्रेष्ठो दिवाकर:।
ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो बलश्रेष्ठस्तु मारुत:॥
मारुतं मरुतां श्रेष्ठं सर्वप्राणिभिरीडितम्।
आवाहय त्वं नियमात् पुत्रार्थं वरवर्णिनि॥
स नो यं दास्यति सुतं स प्राणबलवान् नृषु।)
ततस्तथोक्ता भर्त्रा तु वायुमेवाजुहाव सा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'प्रिये! क्षत्रिय अपने बल के कारण महान् माना जाता है। अतः तुम बल में श्रेष्ठ पुत्र का वरण करो। जैसे समस्त यज्ञों में अश्वमेध श्रेष्ठ है, पूर्ण प्रकाश देने वालों में सूर्यदेव प्रधान हैं और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, वैसे ही वायुदेव सबसे बलवान हैं। अतः हे सुंदरी! इस बार पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से तुम समस्त प्राणियों द्वारा स्तुति किए जाने वाले देवताओं में श्रेष्ठ वायुदेव का विधिपूर्वक आवाहन करो। वे जो पुत्र हमें देंगे, वह मनुष्यों में सबसे बलवान और पराक्रमी होगा।' अपने पति की यह बात सुनकर कुन्ती ने वायुदेव का आवाहन किया॥ 11॥
 
'Dear! A Kshatriya is said to be great because of his strength. Therefore, choose a son who is the best in strength. Just as Ashwamedha is the best among all sacrifices, the Sun God is the chief among those who give complete light and the Brahmin is the best among men, similarly Vayu Dev is the most powerful. Therefore, beautiful lady! This time, for the purpose of getting a son, you should invoke Vayu, the greatest of gods, praised by all creatures, in a proper manner. The son he will give us will be the strongest and most powerful among men.' On hearing this from her husband, Kunti then invoked Vayu Dev.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)