मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशा:।
अजैकपादहिर्बुध्न्य: पिनाकी च परंतप॥ ६८॥
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते।
स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे॥ ६९॥
अनुवाद
शत्रुदमन महाराज! मृगव्याध और सर्प, महान निऋति और अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और पिनाकी, दहन और ईश्वर, कपाली और स्थाणु और भगवान भग - ये ग्यारह रुद्र भी आकाश में आकर खड़े हो गये। 68-69॥
Shatrudaman Maharaj! Mrigavyadha and Sarpa, the great Nirriti and Ajaikapada, Ahirbudhnya and Pinaki, Dahan and Ishwar, Kapali and Sthanu and Lord Bhaga – these eleven Rudras also came and stood there in the sky. 68-69॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)