श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 122: युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनकी उत्पत्ति  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  1.122.50-51 
समवेत्य च देवानां गणा: पार्थमपूजयन्।
काद्रवेया वैनतेया गन्धर्वाप्सरसस्तथा।
प्रजानां पतय: सर्वे सप्त चैव महर्षय:॥ ५०॥
भरद्वाज: कश्यपो गौतमश्च
विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठ:।
यश्चोदितो भास्करेऽभूत् प्रणष्टे
सोऽप्यत्रात्रिर्भगवानाजगाम॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर देवतागण वहाँ एकत्रित होकर अर्जुन की स्तुति करने लगे। कद्रू (सर्प) के पुत्र, विनता (गरुड़) के पुत्र, गन्धर्व, अप्सराएँ, प्रजापति, सप्तर्षि - भारद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वशिष्ठ तथा सूर्यास्त के पश्चात नक्षत्र रूप में उदय होने वाले भगवान अत्रि भी वहाँ आ गए। 50-51॥
 
Then the gods gathered there in droves and started praising Arjuna. The sons of Kadru (serpent), the sons of Vinata (the eagle bird), the Gandharvas, the Apsaras, Prajapati, the seven sages - Bharadwaja, Kashyap, Gautam, Vishwamitra, Jamadagni, Vashishtha and Lord Atri, who rises after sunset in the form of a constellation, also came there. 50-51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)