एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्ती शुश्राव सूतके।
वाचमुच्चारितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम्॥ ४७॥
बभूव परमो हर्ष: शतशृङ्गनिवासिनाम्।
तथा देवनिकायानां सेन्द्राणां च दिवौकसाम्॥ ४८॥
अनुवाद
कुन्ती ने सौरि से यह अद्भुत समाचार सुना। आकाश से आई उस गम्भीर वाणी को सुनकर शतश्रृंग में निवास करने वाले ऋषिगण तथा विमानों पर निवास करने वाले इन्द्र आदि देवताओं के समूह को बड़ी प्रसन्नता हुई।
Kunti heard this wonderful news from Sauri. On hearing that loud voice from the sky, the sages residing in Shatashringa and the group of gods like Indra etc. residing on the planes were very happy.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)